Friday, April 12, 2019

अमर शहीद संत कंवर राम साहिब / डॉ लाल थदानी

अमर शहीद संत कंवर राम साहिब जी की जय / डॉ लाल थदानी

संत कंवरराम साहेब जी का *जन्म 13 अप्रैल 1885* को सिंध प्रांत में *जरवार ग्राम में* हुआ था। उनके पिता का नाम ताराचंद तथा माता का नाम तीर्थबाई था।  संत कंवरराम साहेब जी के गुरु का नाम श्री सतराम दास साहिब जी था। बाल्यावस्था से ही इनकी रुचि भजन कीर्तन,गायन व भक्ति भाव मे थी। रोजगार व उदरपूर्ति हेतु इनकी माता इन्हें प्रतिदिन चने (सिन्धी मे कोंहर बोलते हैं )  उबालकर विक्रय हेतू दिया करती थीं। तब ये नन्हा-सा बालक भक्ति भरे भाव से प्रभु की महिमा का गुणगान करता हुआ चने बेचता था। एक दिन इनकी मधुर ध्वनि सुनकर गुरु सतरामदास ने इन्हें अपने समक्ष बुलाया और भजन सुनाने के लिए कहा।तत्पश्चात् रहिड़की के प्रसिध्द  दरबार मे इन्हें स्वीकार कर लिया गया और महाज्ञानी संगीतज्ञ श्री हासाराम जी से संगीत की शिक्षा ग्रहण की साथ ही अपने गुरु साईं सतरामदास साहेब जी की छत्रछाया में बहुत ज्ञानवान हो गए। गुरु की मृत्यु के पश्चात उनका सारा कार्यभार संत कंवरराम जी के कंधों पर आ पड़ा ।संत कंवरराम साहेब  जी गांव - गांव जाकर भक्ति के माध्यम से ईश्वर वंदना करने लगे ।
            एक बार सिंध के सख्खर जिले में महात्मा गांधी जी पधारे । गांधी जी वहां पहली बार पधारे थे, इसलिए उनका दर्शन करने तथा भाषण सुनने के लिए लाखों लोग एकत्रित हो गए । भीड़ के कारण वहां बहुत शोर हो रहा था ।मंच पर उपस्थित नेताओं के प्रयत्न करने से भी शोर शांत नहीं हुआ। तब मंच पर उपस्थित नेताओं ने सामने पंक्ति में बैठे संत कंवर राम साहिब जी को देखा और गांधी जी से आज्ञा लेकर उन्हें निवेदन किया कि आप इस शोर को शांत कीजिए । जैसे ही लोकप्रिय कंठ के धनी इस महान संत ने माईक पर आकर लोगों से शांत रहने की अपील की तो पल भर में ही सारा शोर शांत हो गया ।तब गांधीजी ने भी इस लाड़ले संत की भूरी-भूरी प्रशंसा की।    
               मानव सेवा ही संत कंवर राम साहिब जी का मुख्य ध्येय था । अपंगो, नेत्रहीनो एवं रोगियों की सेवा अपने हाथों से करके वे स्वयं को धन्य मानते थे ।
               एक बार सत्संग करते समय एक महिला ने अपने मृत नवजात शिशु को संत की झोली में डाल दिया। केवल महिला ही जानती थी कि बच्चा मर चुका है पर जैसे ही संत कंवर राम साहिब जी ने उस बच्चे को गोद में लेकर लोरी गाई तो वह मृत बच्चा जीवित हो गया ।महिला रोते हुए संत के चरणों में गिर पड़ी ।बाद में उस महिला ने वहां उपस्थित सभी लोगों को अपने साथ हुए चमत्कार के बारे में बताया तो सभी लोग अचंभित हो उठे।
               संत कंवर राम जी का सदैव एकता और भाईचारे का प्रचार करते थे । सांप्रदायिक भाईचारे के विरोधी एक पीर ने अपने अनुयायियों को इस संत के खिलाफ भड़काया । एक दिन भजन के पश्चात अपनी भजन-मंडली के साथ एक जब संत कंवरराम जी *रुक रेलवे स्टेशन* पर पहुंचे, तब दो बंदूकधारियों ने उनको आकर प्रणाम किया और कार्य सिद्धि के लिए संत जी से दुआ मांगी । गाड़ी चलते ही उन लोगों ने संत कंवरराम जी को( *1 नवंबर 1939 को* ) के दिन गोली मार दी । सर्वधर्म समभाव का ध्वज फहराने वाले मानवता के इस मसीहा ने प्राण त्याग दिए ।उनके शहीद होने की खबर लगते ही सिंध प्रांत के सभी स्कूल, कॉलेज, ऑफिस और बाजार बंद हो गए। दीपावली के त्यौहार में उस वर्ष पूरे प्रांत में दीपक नहीं जलाए गए ।
              अमर शहीद संत कंवरराम साहेब जी की स्मृति में  *1940* से संपूर्ण देश और विदेश में उनकी जयंती व पुण्यतिथि मनाई जा रही है। उनकी स्मृति में सिंधी समाज द्वारा गठित धर्मशालाएं, गौशालाएं, शिक्षण -संस्थाएं ,अस्पताल, विधवा -आश्रम आज भी सुचारू रूप से चल रहे हैं ।
         *ऐसे महान सत्पुरुष को संपूर्ण राष्ट्र का शत शत नमन*🙏🏻🙏🏻

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